बिना पुरोहित, बिना मुहूर्त और बिना कर्मकांड संविधान व समाज सुधारकों को साक्षी मानकर हुआ विवाह
परभणी :
पाथरी निवासी सोपान मारुति दातरे एवं सावित्री सोपान दातरे के सुपुत्र एड. संदीप सोपान दातरे तथा दशरथ भिवाजी तांबे एवं मंगल दशरथ तांबे की सुपुत्री अर्चना दशरथ तांबे का विवाह 28 जून 2026 (रविवार) को सेलू स्थित अक्षदा मंगल कार्यालय में पारंपरिक रूढ़ियों और ब्राह्मणवादी कर्मकांडों को पूरी तरह त्यागते हुए सत्यशोधक विवाह पद्धति से संपन्न हुआ। इस वैचारिक विवाह ने समाज के सामने एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया।
आज भी समाज के अधिकांश हिस्सों में विवाह के नाम पर लड़की देखने की प्रथा, दहेज, मान-सम्मान के नाम पर अनावश्यक खर्च, कर्मकांड और कन्यादान जैसी परंपराएं प्रचलित हैं। इन्हीं सामाजिक कुरीतियों को नकारते हुए नवदंपति ने वैचारिक और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में सत्यशोधक विवाह का मार्ग चुना।
दूल्हे एड. संदीप दातरे ने बताया कि उन्होंने समाज में वर्षों से चली आ रही इन रूढ़ियों को करीब से देखा है। इसी कारण उन्होंने पहले से ही यह तय कर लिया था कि विवाह करेंगे तो समानता, विज्ञान और विवेक के आधार पर ही करेंगे। उन्होंने कहा कि उनकी जीवनसंगिनी अर्चना भी समान विचारधारा की होने के कारण सत्यशोधक विवाह का निर्णय दृढ़ता से लिया गया।
विवाह में लिए गए प्रमुख निर्णय
- शुभ मुहूर्त देखने के बजाय सभी की सुविधा अनुसार विवाह तिथि स्वयं निर्धारित की गई।
- कुंडली और ज्योतिष के स्थान पर विज्ञान और तर्क पर विश्वास रखा गया।
- मंच पर देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के बजाय महान समाज सुधारकों के चित्र तथा भारत के संविधान की प्रतिकृति रखी गई।
- अक्षत (चावल) के स्थान पर अन्न की बर्बादी रोकने के लिए अतिथियों को पुष्प-पंखुड़ियां दी गईं।
- मंगलाष्टक के स्थान पर सत्य, कर्तव्य, समानता और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित पंचाष्टक का वाचन किया गया।
सत्यशोधक विवाह का मूल उद्देश्य मानवता, समानता, विवेक और अनावश्यक कर्मकांडों का त्याग है। इस विवाह में बिना किसी पुरोहित के दूल्हा-दुल्हन ने समान अधिकार, परस्पर सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की शपथ लेकर अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत की।
नवदंपति का कहना है कि यह विवाह केवल व्यक्तिगत समारोह नहीं, बल्कि समाज के प्रति उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक संदेश है। आज के शिक्षित युवाओं को अंधविश्वास छोड़कर विज्ञान, समानता और संविधान के मूल्यों को अपनाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता और परिवार ने इस निर्णय में पूरा सहयोग दिया, जिससे समाज के अनेक प्रश्नों का दृढ़ता से उत्तर देना संभव हुआ।
समाज सुधारकों के विचारों का दिया संदेश
विवाह स्थल के प्रवेश द्वार पर महात्मा ज्योतिराव फुले, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, छत्रपति शाहू महाराज, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे तथा माता रमाई आंबेडकर सहित अनेक समाज सुधारकों के विचारों पर आधारित पोस्टर लगाए गए थे। इन पोस्टरों के माध्यम से जाति, धर्म, महिला शिक्षा, अंधविश्वास उन्मूलन, समानता और सामाजिक न्याय का संदेश उपस्थित लोगों तक पहुंचाया गया।
इस ऐतिहासिक सत्यशोधक विवाह समारोह में सामाजिक, राजनीतिक तथा शैक्षणिक क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, पदाधिकारी एवं समाजबंधु उपस्थित रहे। सभी ने इस वैचारिक पहल की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए नवदंपति तथा दोनों परिवारों को शुभकामनाएं दीं।
यह विवाह समाज में समानता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक परिवर्तन का प्रेरणादायी उदाहरण बनकर सामने आया।
